मुख्यमंत्री की बैठक में DGP मौजूद नहीं,कैसे होगा क्राईम कन्ट्रोल

जंगलराज बनाम विकासवाद का नारा बुलंद करने वाला सुशासन क्यों दिख रहा लाचार

मुख्यमंत्री की बैठक में DGP मौजूद नहीं,कैसे होगा क्राईम कन्ट्रोल

कुंदन पाण्डेय की रिपोर्ट//पटना/न्यूज डेस्क--सुशासन का नाम लेते ही बिहार में अगर किसी का चेहरा सामने आता है तो वो है नीतीश कुमार।खैर लाजमी भी है।जंगल राज बनाम सुशासन का नारा बुलंद कर सत्ता पर काबिज होने वाले सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पिछले 20 वर्षो से लगातार बिहार की कुर्सी पर बने हुए है।लगातार चुनावी उथल पुथल के बावजूद भी मुख्यमंत्री का चेहरा नही बदल रहा है। कई पार्टियां आईं, गई, बनी, बिगड़ी पर चेहरा एक नीतीश कुमार।राजनीति के खेल में नीतीश कुमार को बिहार की राजनीति का चाणक्य कहा जाता है।बिहार में कानून व्यवस्था की बात करें तो श्री कुमार के प्रारंभिक कार्यकाल में लॉ एंड ऑर्डर ही प्राथमिकता रही थी, और इन्होंने ही जंगलराज बनाम विकास का नारा बुलंद किया था।

बातें बहुत है पर कुछ समय से बिहार के कानून व्यवस्था को लेकर काफी, उहापोह वाला वाली स्थिति रही है।कुछ दिन पहले नवादा में दलितों के घर जलाने वाले मामले को लेकर पुलिस महकमा लगातार सक्रिय नजर आ रहा है।नीतीश कुमार खुद इसकी मॉनिटरिंग कर रहे है।हाई लेवल मीटिंग भी किया। पर मीटिंग में न तो बिहार के नवनियुक्त डीजीपी आलोक राज मौजूद रहे और न ही एडीजी स्तर का कोई अधिकारी मौजूद रहा।फिर भी नीतीश कुमार वही घिसा पिटा पुराना आदेश जारी कर दिए जो वर्षो से करते आ रहे है। पर यह सवाल यह उठता है कि जब कोई, मुख्य धारा का शीर्ष अधिकारी मौजूद ही नही था तो वो फरमान किसे जारी कर रहे थे? नीतीश कुमार की सर्वोच्चता का अंदाजा आप इसी से लगा सकते है। इससे साफ जाहिर होता है की बिहार में कानून ववस्था का पूरा एक्सलरेशन नीतीश बाबू के हाथों में है।

नीतीश कुमार ने क्या निर्देश दिया।

सीएमओ द्वारा मिली जानकारी के अनुसार नीतीश कुमार ने कहा कि पुलिस प्रशासन कानून ववस्था को दुरुस्त करने के लिए पूरी मुस्तैदी से काम करे। अपराध नियंत्रण के लिए सख्ती अपनाए। रात्रि गस्ती दल पर पुलिस के आला अधिकारी खुद  क्षेत्र जाकर औचिक निरीक्षण करें।
साथ ही नीतीश कुमार ने कहा कि लंबित पड़े मामलो के अनुसंधान में तेजी लाए। ससमय उसका निराकरण हो। और जो भी पुलिस अधिकारी लापरवाही बरतेंगे उनपर भी कार्यवाई होगी। खैर इन सारी बातों में उन्होंने एक भी नई बात नही की। बस वही पुरानी बातों को दोहराया।

आखिर पूरा मामला क्या है? समझिए।

नीतीश कुमार ने जितने भी दिशा निर्देश दिए वो सब पुलिस महकमे से जुड़े निर्देश थे। पर सीएम की मीटिंग में पुलिस मुख्यालय से जुड़े कोई भी मुख्य धारा का शीर्ष पदाधिकारी मौजूद नही था। यहां तक कि बिहार के नए पुलिस महानिदेशक आलोक राज तक नही थे। इसके अलावा भी लॉ एंड ऑर्डर से जुड़े कोई भी बड़ा पुलिस पदाधिकारी मौजूद नही था।जब कोई अधिकारी ही नही था तो नीतीश कुमार आदेश किसे दे रहे थे? अब जानिए की आखिर मीटिंग में पुलिस पदाधिकारी के तौर पर कौन कौन मौजूद थे। मीटिंग में होमगार्ड और फायर ब्रिगेड की डीजी शोभा आहोतकार( जिनका पूर्व में सीनियर आईपीएस विकाश वैभव जो की अभी बिहार योजना परिषद के परामर्शी सदस्य है,के साथ विवाद भी रह चुका है।)और होमगार्ड के आईजी सुनील कुमार शामिल थे। जबकि इनलोगो के क्षेत्राधिकार में लॉ एंड ऑर्डर से जुड़ा कोई काम ही नहीं है।

डीजीपी ने बैठक से बनाई दूरी।

बिहार की कानून ववस्था को लेकर हो रहे मीटिंग में खुद बिहार के डीजीपी अनुपस्थित रहे। साथ ही लॉ एंड ऑर्डर का कोई भी बड़ा पदाधिकारी मौजूद नही रहा। इसके कई कयास लगाए जा रहे है। माना जा रहा है की नीतीश कुमार बस उसकी ही सुनते है जो उनके हां में हां करे। यही कारण है कुछ आला अधिकारी दूरी बना के रखते है।

तेज अफसरों को साइड लाइन रखना
 
यह भी कहा जाता है नीतीश कुमार पुलिस महकमे के तेज तर्रार अधिकारियों को साइड लाइन करके रखते है। या तो उन्हे वैसा विभाग दे दिया जाता है जहां कोई विशेष काम ही नहीं होता है। इसका एक कारण राजनीति दवाब भी हो सकता है। और जो अफसर अपने पद के हिसाब से कार्य करना चाहते है तो उन्हे फ्री हैंड नही दिया जाता है।इसका एक उदाहरण पुर्व डीजीपी आर एस भट्टी की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति,शिवदीप लांडे और काम्या मिश्रा के इस्तीफे से भी जोड़ कर देखा जा सकता है।इस कारण या तो पद त्याग देना होता है। या फिर ठंडे बस्ते में पड़े रहना होता है। 

पुलिस महकमे में राजनीति हस्तक्षेप 

वर्तमान परिपेक्ष्य में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा की पुलिस महकमे में राजनीतिक दबाव जोड़ शोर से चल रहा है।बैठक में जिन पदाधिकारियों को होना चाहिए वो अनुपस्थित होते है और जिनका लॉ एंड ऑर्डर से कोई नाता नहीं होता वो बैठक में शिरकत करते है।इन सब से अलग वाक्या पटना जिले के कुछ थाने में देखने की मिल रहा है जहां अल्प समय के कार्यकाल में ही थानाध्यक्षों को इधर से उधर किया चुका है।अब अल्प समय में ही उपलब्धिपूर्ण कार्य करने वाले थानाध्यक्षों का तबदला होना राजनीति हस्तक्षेप की तरफ ही इशारा करते है।वही दूसरी ओर उसी थाने की कमान नव प्रोन्नत कर वैसे थानाध्यक्ष को दिया जाता है जिनका भले ही ट्रेक रिकॉर्ड अच्छा हो लेकीन न तो पुलिस विभाग ज्वाइन किए अधिक समय हुआ है और न ही उनको लंबे पुलिसिंग का अनुभव है। जिसका विभाग में बड़ा ही महत्व है।इस तरह के प्रकरण से स्पष्ट होता है की पुलिस विभाग में दबाव और राजनीति का खेल है।

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