बिहार में सुशासन के इकबाल पर लगा सवालिया निशान, पटना नजर आ रही रक्त रंजीत, 3 दिन में 5 हत्या

जनता पूछ रही है, सोच रही है, ढूंढ रही है कि कहां गए सुशासन बाबू के वो पुराने तेवर और कहां गया पुलिस का वो इकबाल?

बिहार में सुशासन के इकबाल पर लगा सवालिया निशान,  पटना नजर आ रही रक्त रंजीत, 3 दिन में 5 हत्या

कुंदन पाण्डेय की रिपोर्ट//पटना-- बिहार, जो कभी 'जंगलराज बनाम विकासवाद' के नारे के साथ 'सुशासन बाबू' नीतीश कुमार के नेतृत्व में कानून-व्यवस्था की एक नई मिसाल कायम करने का दावा करता था, आज अपनी ही बनाई हुई छवि को खोता दिख रहा है। राजधानी पटना पिछले तीन दिनों से अपराध की घटनाओं से रक्तरंजित हो रही है, जहां अपराधी बेखौफ होकर पुलिस को खुली चुनौती दे रहे हैं।

 

पटना में बेखौफ अपराधी, पुलिस की 'चुस्ती' पर सवाल

 

राजधानी पटना में बदमाशों का तांडव लगातार जारी है। पाटलिपुत्र थाना क्षेत्र के मैनपुरा में दो युवकों को गोली मार दी गई, जिसमें एक की मौत हो गई और दूसरा पीएमसीएच में इलाजरत है। इस घटना ने इलाके में दहशत का माहौल बना दिया है। इससे पहले सोमवार देर रात बिक्रम थाना क्षेत्र के मंझौली-सिंघाड़ा मार्ग पर दो युवकों को छह-छह गोलियां मारकर मौत के घाट उतार दिया गया था। ये दोनों युवक चौकीदार धर्मेंद्र पासवान की हत्या के आरोपी थे और जेल भी जा चुके थे। वहीं, पटना के आलमगंज इलाके में भी अपराधियों ने घर में घुसकर मां-बेटी की हत्या कर दी। इस वारदात का एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें अपराधी बंदूक के साथ दिखाई दे रहे थे। यानी 72 घंटों में कुल 7 लोगों को गोली मारी गई, जिसमें 5 की मौत हो चुकी है। इन लगातार होती आपराधिक घटनाओं ने पुलिस की कार्यप्रणाली और 'सुशासन' के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

कहां गया 'सुशासन' का इकबाल?

 

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जो एक दशक से अधिक समय से बिहार की सत्ता पर काबिज हैं और 'कानून का राज' स्थापित करने का दावा करते रहे हैं, उनके कार्यकाल में अब अपराधियों में पुलिस का खौफ नजर नहीं आ रहा। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी प्रसाद यादव लगातार बिहार में बिगड़ती कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार पर हमलावर हैं। वे 'क्राइम बुलेटिन' भी जारी कर रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि राज्य में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार मानते हैं कि नीतीश कुमार के चौथे कार्यकाल के अंतिम दौर में बिहार की कानून-व्यवस्था को चौतरफा चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बालू माफिया, हत्या, रंगदारी, लूटपाट, डकैती और चोरी की खबरें रोज अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। संगठित आपराधिक गिरोह आम आदमी को निशाना बना रहे हैं। शराबबंदी के बावजूद नकली शराब का धंधा फल-फूल रहा है।

 

दवा का असर कम', जनता पूछ रही सवाल

 

कुछ समय पहले बिहार से जुड़े एक वरिष्ठ पत्रकार ने मीडिया में कहा था कि नीतीश कुमार की सरकार सुशासन के लिए जानी जाती थी, लेकिन अब ऐसा लगता है कि 'दवा का असर कम हो गया है'। जिस तरीके से आपराधिक घटनाओं में वृद्धि हुई है, उससे सरकार के इकबाल पर सवाल उठना स्वाभाविक है। डीजीपी विनय कुमार ने पदभार ग्रहण करते हुए अपराधियों को न बख्शने की बात कही थी, लेकिन उसका असर जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है। सरकार का पहला दायित्व लोगों की जान-माल की सुरक्षा देना होता है, और इसमें हो रही कमी चिंता का विषय है।

 

केवल नारों से नहीं, तो क्या भय से स्थापित होगा सुशासन

 

यह स्पष्ट है कि 'सुशासन' केवल नारों से स्थापित नहीं हो सकता। इसके लिए अपराधियों में कानून का भय पैदा करना पड़ता है। बिहार में पिछले कुछ सालों में भले ही राजनीतिक उथल-पुथल रही हो, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहे हैं। जिस 'जंगलराज बनाम विकासवाद' का नारा बुलंद कर वे एक दशक से सत्ता पर काबिज हैं, उस सुशासन में अब जंग लग रहा है। अगर 2005 से पहले बिहार में 'जंगलराज' था, तो 2025 में अपराधियों का यह बेखौफ तांडव किस 'महामंगल राज' की ओर इशारा करता है? जहां अपराधियों में पुलिस का इकबाल ही न हो, वहां सुशासन और बेहतर कानून-व्यवस्था का दावा कैसे किया जा सकता है? कोई भी वर्तमान सरकार लंबे समय तक अपनी कुव्यवस्था का दोष पूर्व सरकारों पर मढ़कर मुक्त नहीं हो सकती। बिहार में हिंसा और अपराध का पुराना इतिहास रहा है, इसलिए सुशासन की सरकार को यह मानकर निश्चिंत नहीं होना चाहिए कि अपराधियों की प्रवृत्ति बदल जाएगी।

 

भारी आकांक्षाओं और आशाओं के बीच, बिहार का हर वो आम इंसान जो कानून के राज को अपना सूचक समझता है, वह सुशासन की सरकार और पुलिस को उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है। जनता पूछ रही है, सोच रही है, ढूंढ रही है कि कहां गए सुशासन बाबू के वो पुराने तेवर और कहां गया पुलिस का वो इकबाल?

 


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